Friday, March 25, 2016

देखी जड़ों की घहराई!!

पूर्वा के दामन पे दाग घहरे हैं
इसीलिए...
किसी को पश्चिम बनाना पड़ा
चौबीस पहर ठिकरी पहरा बिठाना पड़ा!

देखी जड़ों की घहराई
जैसे घास हो उगाई
देखी पूर्वा की पवित्रता
जिसे साबित करने के लिए
किसी को पश्चिम बनाना पड़ा
चौबीस पहर ठिकरी पहरा बिठाना पड़ा!

नौच डाला अंग अंग
इसीलिए...
भेड़ियों के भीहड़ ने?
चिर फाड़ कर डाला
आत्मा का...
हर एक कण कण
इसीलिए...
भेड़ियों के भीहड़ ने?

बैठे हैं प्रहरी यहाँ
जो कहते हैं खुद को 
रखवाले संस्कृति के!
विकृत है दिमाग़ उनके
ज़ुबान मत खोलना
वरना मारे जाओगे!
जो आह भी निकली तो
पागल करार दिए जाओगे!

जितना ज्यादा चिलाओगे
उतने ही रोंदे जाओगे
क्यूंकी...
पूर्वा के दामन पे दाग घहरे हैं
इसीलिए...
पश्चिम पर ठिकरी पहरे हैं!

खेलते हैं वो क्रिकेट
तो कभी फूटबाल
भावनाओ से, रिश्तो से
क्यूंकी...
पूर्वा के दामन पे दाग घहरे हैं
इसीलिए...
किसी को पश्चिम बनाना पड़ा
चौबीस पहर ठिकरी पहरा बिठाना पड़ा

वो पश्चिम हुआ ना वश में
फँश गये अपने ही चक्कर में
जितना ज्यादा चकरवयूह चलाया
उतना ही ज़्यादा
खुद का ही विकृत रूप दिखाया
सुना है पाँच साल का ठिकरी पहरा
आज है रंग लाया! सच में!

बस ये मत पूछना
उन रंगों ने कितने बदरगो को है छुपाया!!
क्यूंकी...
पूर्वा के दामन पे दाग घहरे हैं
इसीलिए...
पश्चिम पर ठिकरी पहरे हैं! 

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