Thursday, December 12, 2013

Human O' Human!

कहानियाँ कल भी बनती थी
कहानियाँ आज भी बनती हैं
घटनाये और दुर्घटनाए
दोनो ही कल भी घटती थी
और वो आज भी घटती हैं
लोग ऐसे और वैसे कल भी थे
और वो आज भी हैं!

वक़्त के साथ फर्क शायद इतना ही है
कल घर की बातें घर में ही होती थी
और सुलझे हुये लोग उन्हे मिल-बैठकार
घर में ही सुलझाते थे
मगर फिर भी कुछ कानफूस-लोग
मिर्च-मसाला लगाकर उन्हे बतंगड
कल भी बनाते थे, और आज भी बनाते हैं!

आज भी शायद वो सभी टाइप हैं
उलझाने वाली भी और सुलझाने वाली भी
तोड़-मरोड़-जोड़ कर अट्टहास करने वाली भी
और साज-संभाल कर मिठास लाने वाली भी!
हाँ! जो कल था, वो आज भी है
दुनिया ऐसी और वैसी कल भी थी, आज भी है
इंसान जैसे कल थे, वैसे ही आज भी हैं!!

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