Friday, December 13, 2013

Culture of Vultures!!

गली से गुजरे लड़की कोई, तो सिटी बजाओ मजाक उडाओ
कभी सीधी तो कभी उल्टी-सीधी भाषा में गाली देकर
कॉमेंटरी कर हाहाकार करो, ठहाके लगाओ, खिल्ली उडाओ
ये है शायद अनपढ़-गवाँरो की भाषा
मगर जताओ रोब फिर भी और बोलो संस्कारी हैं हम!!

कुछ अक्सर पढ़कर ऐसे ही संस्करियों के
रहण-सहन के तरीके, भाषा-परिभाषा बदल जाते हैं
मगर सलीका रहता है वही, मिले मौका जहां कहीं
कसते चलो तुम फबत्तियों पे फबत्तीया
बड़ा मज़ा आ रहा है न, देखो फिर भी संस्कारी हैं हम!!

जितने अक्सर जयादा पढ़े, जितने बड़े ये कहलाये
ऐसी कल्चर वालों ने, उतने ही जटिल और गुंथे हुये
तरीके अपनाये  इस हाहाकारी के
बस ख्याल रखो इतना, रह ना जाये दांव-पेंच ढीला कोई 
और उठने ना पाये, उंगली कहीं इधर-उधर से!!

फिर मतलब इन्हे इससे क्या
ऋण्दन कहाँ हुआ, कृन्दन कहाँ-कहाँ हुआ
इनकी इस दो धारी तलवार ने
क तरफ जहां घर से बाहर प्रहार किया
वहीं दूसरी तरफ खुद के कुछ रिस्तों को तार-तार किया!!

वो बोलें या ना बोलें
चाहे संबल बन फिर भी साथ इनके डटें रहे
फिर भी सुना ऋण्दन कितनो ने ही, उस गहरी-सी खमोसी में भी
क्योंकि ना जाने क्या-क्या लगा दिया दांव पर 
इनकी इस कल्चर ने!!

अगर इसी को कल्चर कहते हैं
तो मैं उसे कल्चर ऑफ वल्चर्स कहूँगी!!

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